खुशी, सेंटर फॉर रिहैबिलिटेशन एंड रिसर्च तथा जीसीसीआई, अन्य संगठनों के साथ मिलकर 13 अक्टूबर 2025 को गौमाता (गाय) और पंचगव्य पर एक दिवसीय राष्ट्रीय चर्चा का आयोजन कर रहे हैं।
यह शिखर सम्मेलन गौ सेवा क्षेत्र के विशिष्ट नेताओं और विद्वानों को एक साथ लाकर गौ एवं पंचगव्य की बहुआयामी भूमिका पर विचार-विमर्श करेगा, जिससे सतत भविष्य का निर्माण संभव हो सके।
मुख्य चर्चा विषय:
- भारतीय गौवंश (Bharatiya Gauvansh): भू-अर्थशास्त्र, आपदा जोखिम न्यूनीकरण एवं जलवायु परिवर्तन की चुनौतियाँ।
- गौ नीतियाँ, योजनाएँ एवं चुनौतियाँ।
- नारी स्वावलंबन।
- गौमाता की भूमिका: स्वास्थ्य, शिक्षा, कृषि, पशुधन, ऊर्जा एवं सतत विकास में योगदान।
विशिष्ट वक्ता:
- श्रीमती रेखा गुप्ता (माननीय मुख्यमंत्री, दिल्ली)
- डॉ. एस. पी. सिंह बघेल (राज्य मंत्री, मत्स्य मंत्रालय)
- डॉ. रामदास अठावले (राज्य मंत्री, सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय)
- डॉ. सुरेश प्रभु (कुलाधिपति, ऋषिहुड विश्वविद्यालय)
- श्री अजीत महापात्रा जी (संयोजक, अखिल भारतीय गौ सेवा गतिविधि)
ये सभी महत्वपूर्ण विषयों पर अपने विचार और अनुभव साझा करेंगे।
इसके अतिरिक्त, डॉ. वल्लभभाई कठीरिया (अध्यक्ष – जीसीसीआई, पूर्व मंत्री – भारत सरकार, पूर्व अध्यक्ष – राष्ट्रीय कामधेनु आयोग) भी गौ आधारित अर्थव्यवस्था पर अपना दृष्टिकोण प्रस्तुत करेंगे। यह मॉडल भारतीय देशी गायों की सतत ग्रामीण विकास, कृषि, स्वास्थ्य और सांस्कृतिक परंपराओं में अहम भूमिका को रेखांकित करता है। प्राचीन पंचगव्य ज्ञान (दूध, दही, घी, गोबर, गोमूत्र) को आधुनिक शोध से जोड़कर यह आत्मनिर्भर और पर्यावरण–अनुकूल जीवनशैली की दिशा में मार्ग प्रशस्त करता है।
गौ आधारित अर्थव्यवस्था के प्रमुख पहलू:
1. कृषि
- गोबर प्राकृतिक खाद के रूप में, मिट्टी की उर्वरता बढ़ाता है।
- गोबर व गोमूत्र आधारित जैव-कीटनाशक से रसायनों पर निर्भरता कम।
- बैल हल चलाने में सहायक, जीवाश्म ईंधन की खपत में कमी।
2. स्वास्थ्य एवं कल्याण
- पंचगव्य औषधियों का आयुर्वेद में उपयोग।
- रोग प्रतिरोधक क्षमता व उपचारात्मक गुण।
3. ऊर्जा
- गोबर से बायोगैस उत्पादन।
- सस्ती एवं नवीकरणीय ग्रामीण ऊर्जा का स्रोत।
4. उद्योग एवं ग्रामीण रोजगार
- गोबर आधारित उत्पाद: साबुन, अगरबत्ती, पेंट, निर्माण सामग्री।
- ग्रामीण समुदाय के लिए रोजगार और आय के अवसर।
5. पर्यावरणीय लाभ
- प्राकृतिक खेती से जैव विविधता में वृद्धि।
- मिट्टी और जल प्रदूषण में कमी।
- जलवायु परिवर्तन न्यूनीकरण में योगदान।
6. सांस्कृतिक एवं आध्यात्मिक आयाम
- गाय गौमाता के रूप में पूजनीय, पालन-पोषण और समृद्धि का प्रतीक।
- संस्कारों, त्योहारों और ग्रामीण जीवन का अभिन्न हिस्सा।
महत्व
- भारत की पारंपरिक ज्ञान प्रणाली का आधुनिक संदर्भों में पुनर्जीवन।
- पारिस्थितिक संतुलन के साथ सतत अर्थव्यवस्था को बढ़ावा।
- आत्मनिर्भरता एवं ग्राम-केंद्रित विकास को प्रोत्साहन।
इस प्रभावशाली सेमिनार के आयोजन हेतु साकेत मणि त्रिवेदी और उनकी टीम विशेष बधाई के पात्र हैं।
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✍️ लेखन:
गव्यसिद्ध अमिताभ ए.के. भटनागर
